आमची भूमिका !

सनातन हिंदु धर्म आणि संस्कृती यांच्या विध्वंसनाचे कार्य करणारे खिस्ती आणि इस्लाम यांसारखे धर्म, अर्थ आणि काम यांवर केंद्रित पाश्चात्त्य जीवनरहाटी असणार्‍या विध्वंसकाचे हात बळकट करणारे आपल्या देशातील जे निधर्मी, पुरोगामी आहेत, त्यांचा आधी बंदोबस्त करावा लागेल. बाहेरच्या शत्रूशी केव्हाही लढता येईल; परंतु घरातील या चेकाळणार्‍या शत्रूचे काय ? आधी घरातील विंचू मारा, मग उंबरठ्यावरील सापाला ठेचा. ‘हिंदूंच्या मनावर हे बिंबवणे’, हेच या लेखांचे एकमेव उद्दिष्ट आहे.
Showing posts with label ऋषिस्मृति. Show all posts
Showing posts with label ऋषिस्मृति. Show all posts

Friday, January 31, 2014

भगवान् व्यास ब्राह्मण हैं, शूद्र नहीं

भगवान् कृष्णद्वैपायन व्यास महर्षि परासर के द्वारा माँ सत्यवती से उत्पन्न हुए इन्हें शास्त्रनाभिज्ञ कुछ लोग शूद्र कहते हैं उनका कहना है कि नाविक की कन्या ( शूद्रकन्या ) सत्यवती थीं अतः उनसे महर्षि परासर द्वारा उत्पन्न व्यास जी शूद्र हुए इन लोगों से एक प्रश्न है कि जब शूद्र और ब्राह्मण दोनों से व्यास जी समुत्पन्न हैं तो आप मातृपक्ष को ध्यान में रखकर उन्हें शूद्र ही क्यों मान रहे हैं पितृपक्ष को देखकर उन्हें ब्राह्मण क्यों नही कहते केवल अपना उल्लू सीधा करना है न निष्पक्ष तो माता पिता पर जब ध्यान देगा तो उसे संदेह होगा कि व्यास जी को ब्राह्मण माना जाय या शूद्र किन्तु दुराग्रही अपनी मानसिकता थोपेगा कि वे शूद्र ही थे वस्तुतः उन्हें शूद्र इसलिए मानना कि वे शूद्रकन्या से उत्पन्न हुए थे यह मात्र भ्रान्ति ही है क्योंकि माँ सत्यवती शूद्रकन्या थीं ही नही केवल कैवर्त द्वारा उनका पालन किया गया था उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा जी के शाप से मीनभाव को प्राप्त अद्रिका नामक एक श्रेष्ठ अप्सरा जो यमुना में मछलीरूप में निवास कर रही थीके उदर से हुई थीजिसमे कारण चेदि देश के परम प्रतापी महाराज उपरिचर वसु का वीर्य था 
--- तत्राद्रिकेति विख्याता ब्रह्मशापाद्वराप्सराः मीनभावमनुप्राप्ता बभूव यमुनेचरी || श्येनपादपरिभ्रष्टं तद्वीर्यमथ वासवम् |जग्राह तरसोपेत्य साSद्रिका मत्स्यरूपिणी || 
-- महाभारत,आदिपर्व,अंशावतरणपर्व६३/५८-५९-६०
उपरिचर वसु के वीर्य के प्रभाव से १०वे मास इसके उदर से एक बालक और बालिका को मत्स्यजीवियों ने निकाला और महाराज उपरिचर से इस रहस्य को बतलाया तो उन्होंने बालक को ले लिया जिसका नाम मत्स्य रखा और वह बाद में राजा बना – “ तयोः पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा स मत्स्यो नाम राजाSSसीद्धार्मिकः सत्यसंगरः ||--वहीं ६३व्यास जी की माँ शूद्रकन्या नही --- और जो कन्या थी उसके शरीर से मछली की गंध निकलती थी,उसे महाराज ने मछुवारे को दे दिया जिसका नाम सत्यवती पड़ा— 
“ सा कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यगन्धिनी राज्ञा दत्ता च दाशाय कन्येयं ते भवत्विति ||
--६७दाशकैवर्ते दाशधीवरौअमरकोष१/१०/१५

ध्यातव्य है कि यह कन्या भी एक प्रतापी क्षत्रियराजा के वीर्य द्वारा मत्स्यरूपिणी एक श्रेष्ठ अप्सरा से जन्मी है अतः बीज के प्रभाव को देखते हुए इसे क्षत्राणी ही कहा जा सकता हैशूद्र नही 
“ यस्माद्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोSभवन् पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्बीजं प्रशस्यते |
--मनुस्मृति१०/७२
“ बीजयोन्योर्मध्ये बीजोत्कृष्टा जातिः प्रधानम् 
मन्वर्थमुक्तावली
बीज और योनि के मध्य में उत्कृष्ट बीज वाली जाति ही प्रधान है इसीलिये तिर्यग योनि से समुत्पन्न लोग भी ऋषि हुए हैं और पूजित होने के साथ श्रेष्ठ भी माने गए 

क्या किसी बालक या बालिका का किसी अन्य जातीय व्यक्ति से पालन हो तो उसकी जाति बदल जायेगी माता सत्यवती की उत्पत्ति में किसी शूद्र या शूद्रा के रज अथवा वीर्य का कोई सम्बन्ध ही नहीऐसी स्थिति में केवल पालन करने मात्र से उन्हें शूद्र कहकर व्यास जी को शूद्र मानना केवल प्रज्ञापराध नही तो और क्या है 
विजातीय संसर्ग से सांकर्यदोष ---सांकर्य दोष २ प्रकार का होता है |
१-अनुलोम संकर ,
२- प्रतिलोम संकर 

अनुलोमसंकरउच्च वर्ण के पुरुष का निम्न वर्ण की कन्या के साथ विवाह विहित है मनुस्मृति-३/१३अतः इनसे उत्पन्न संतानें अनुलोम संकर की परिधि में हैं जैसे ब्राह्मण से क्षत्रिय कन्या द्वारा उत्पन्न संतान निषाद,क्षत्रिय से वैश्यकन्या द्वारा उत्पन्न माहिष्य तथा शूद्रकन्या से उत्पन्न उग्र कही जाती है इस प्रकार ब्राह्मण द्वारा ३क्षत्रिय से २ तथा वैश्य से १ कुल मिलाकर अनुलोम संकर संताने ६ प्रकार की हुईं प्रतिलोम संकर चूंकि निम्न वर्ण के पुरुष के साथ उच्च वर्ण की कन्या का विवाह शास्त्रानुमोदित नही है इसलिए शूद्र से ब्राह्मण ,क्षत्रिय और वैश्य की कन्या में उत्पन्न संतानें क्रमशः चांडालक्षत्ता और अयोगव कही जाती हैं
शूद्रादायोगवः क्षत्ता चाण्डालश्चाधमो नृणाम् वैश्यराजन्यविप्रासु जायन्ते वर्णसङ्कराः ||
--मनुस्मृति -१०/१२

ऐसे ही व्यभिचारजन्य संतानें,सगोत्रादि विवाह से समुत्पन्न त्तथा विहित उपनयन संस्कार से रहित व्रात्य संज्ञक संतानें भी वर्ण संकर कही जाती हैं | –अपने अपने वर्ण की विवाहिता कन्या से उत्पन्न संतानें ही अपने अपने वर्ण की होती हैंअन्यनहीं सांकर्य के अपवाद महर्षिगण 
--- उन ब्रह्मर्षियों की संतानों पर भी सांकर्य का प्रभाव नही पड़ता जो अपनी उत्कृष्ट तपश्चर्या से अलौकिक शक्ति सम्पन्न हो चुके हैं अत एव महर्षि विभांडक का अमोघ वीर्य जिसे मृगी पी गयी थीसे समुत्पन्न ऋष्यश्रृंग ब्राह्मण ही हुएउनके लिये विप्रेन्द्र शब्द प्रयुक्त हुआ है 
 “नान्यं जानाति विप्रेन्द्रो नित्यं पित्रनुवर्तनात् |
--वाल्मीकि रामायण,बा.का.९/५
ब्रह्मर्षि भृगु की पौलोमी नामक पत्नी जो पुलोम दानव की कन्या थींउनसे उत्पन्न च्यवन ब्राह्मण ही हुए 
पप्रच्छ च्यवनं विप्रं लवणस्य यथाबलम् |
--वा.रा.उ.का.६७/१

यहाँ माँ दानवकन्या है फिर भी मात्र पिता में ब्राह्मणत्व होने के कारण ही च्यवन में ब्राह्मणत्व आया अब क्षत्रियकन्याओं में ब्रह्मर्षियों द्वारा उत्पन्न संतानें वर्ण संकर न होकर ब्राह्मण ही हुईं इस तथ्य को सप्रमाण प्रस्तुत किया जा रहा है राजर्षि कुशनाभनन्दन गाधि (वा.रा.बा.का.३२/११,) की सत्यवती नामक कन्या से ब्रह्मर्षि ऋचीक का विवाह हुआ---
गाधिश्च सत्यवतीं कन्यामजनयत् तां च भार्गव ऋचीको वव्रे |
---तामृचीकः कन्यामुपयेमे अनन्तरं च सा जमदग्निमजीजनत् |
--विष्णु महापुराण ४/७/१२-१३-१४-१६-३२

यहाँ माता क्षत्रिया और पिता ब्राह्मण हैं फिर भी इन दोनों से समुत्पन्न जमदग्नि ब्राह्मण ही हुएवर्ण संकर नही यदि जमदग्नि जी ब्राह्मण नही होते तो उनसे उत्पन्न परशुराम जी ब्राह्मण कैसे होते इक्ष्वाकुवंशी महाराज रेणु की क्षत्रियकन्या रेणुका जो जमदग्नि की पत्नी थीं उनसे प्रादुर्भूत परशुराम जी ब्राह्मण ही हुएवर्णसंकर नही --- 
“ जमदग्निरिक्ष्वाकुवंशोद्भवस्य रेणोस्तनयां रेणुकामुपयेमे तस्यां चाशेषक्षत्रहन्तारं नारायणांशं जमदग्निरजीजनत् 
विष्णुमहापुराण ४/७/३५-३६
इन परशुराम जी के लिये ब्राह्मण शब्द स्पष्टतया प्रयुक्त हुआ है--- 
“ क्षत्ररोषात् प्रशान्तस्त्वं ब्राह्मणश्च महातपाः 
वा.रा. बा.का,७५/६

यहाँ सत्यवादी महाराज दशरथ ने परशुराम जी को महातपस्वी ब्राह्मण बतलाया है अतः सिद्ध होता है कि असीम शक्ति सम्पन्न ब्रह्मर्षियों से ब्राह्मण पुत्र की समुत्पत्ति हेतु ब्राह्मणकन्या अनिवार्य नही है वे दानव या क्षत्रिय की कन्या से भी ब्राह्मण संतान उत्पन्न कर सकते हैं इसीलिये भगवान मनु भी वीर्य को स्त्रीरूपी क्षेत्र से अधिक महत्त्व देते हुए कहते हैं --
“ यस्माद्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोSभवन् पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्बीजं प्रशस्यते ||
--मनुस्मृति१०/७२
“ बीजयोन्योर्मध्ये बीजोत्कृष्टा जातिः प्रधानम् 
मन्वर्थमुक्तावलीबीज और योनि के मध्य में उत्कृष्ट बीज वाली जाति ही प्रधान है इसीलिये तिर्यग योनि से समुत्पन्न लोग भी ऋषि हुए हैं और पूजित होने के साथ श्रेष्ठ भी माने गए श्रेष्ठता का तात्पर्य उनके ब्राह्मणत्व-- ख्यापन में है जिसे सप्रमाण अभी प्रस्तुत किया जा चुका हैं अतः इन साक्ष्यों के आधार पर ब्रह्मर्षि परासर द्वारा माता सत्यवती से समुत्पन्न भगवान् कृष्णद्वैपायन व्यास ब्राह्मण ही हैंशूद्र नही भागवत महापुराण का साक्ष्य— महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में ऋत्विक ब्राह्मणों के वरण का जब समय आया तो उन्होंने वेदवादी ब्राह्मणों का वरण किया जिनमें भगवान् व्यास का उल्लेख द्वैपायन शब्द से सुस्पष्ट किया गया है---
“ इत्युक्त्वा यज्ञिये काले वव्रे युक्तान् स ऋत्विजः |कृष्णानुमोदितः पार्थो ब्राह्मणान् वेदवादिनः || द्वैपायनो भरद्वाजः सुमन्तुर्गौतमोSसितः |
--भा.पु.१०/७४/६-७

यहाँ भगवान् कृष्णद्वैपायन का नाम सबसे पहले उल्लिखित है | ( यहाँ द्वैपायन शब्द कृष्णद्वैपायन का वाचक है इसके पूर्वपद कृष्ण का “ विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः ”—इस वार्तिक से लोप हो गया है | ) 
इतना ही नही ,जब भगवान् श्रीकृष्ण विदेहनगरी में पधारते हैं,उस समय उनके साथ कृष्णद्वैपायनव्यास तथा उनके पुत्र स्वयं शुकदेव जी भी हैं |इसका उल्लेख स्वयं शुकदेव ही कर रहे हैं --- 
“ आरुह्य साकं मुनिभिर्विदेहान् प्रययौ प्रभुः || नारदो वामदेवोSत्रिः कृष्णो रामोSसितोSरुणिः अहं बृहस्पतिः कण्वो मैत्रेयश्च्यवनादयः ||
--भागवत महापुराण,१०/८६/१७-१८
यहाँ कृष्णः शब्द कृष्णद्वैपायन का वाचक है उसके उत्तरपद द्वैपायन का 
“ विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः 
इस वार्तिक से लोप हो गया है यहाँ अहं शब्द से शुकदेव जी ने अपना उल्लेख किया है इन सबको यहाँ द्विज कहा गया है 
न्यमन्त्रयेतां दाशार्हमातिथ्येन सह द्विजैः मैथिलः श्रुतदेवश्च युगपत् संहताञ्जली ||
--भा.पु.१०/८६/२५

क्या इससे कृष्ण द्वैपायन व्यास ओर उनके पुत्र का ब्राह्मणत्व स्पष्ट नही हो रहा है भगवान् वेदव्यास शूद्र होते तो उनके पुत्र शुकदेव और स्वयं उनको यहाँ द्विज क्यों कहा जाता इतने पर भी व्यास जी को शूद्र कहने वालों तुम्हे संतोष न हो रहा हो तो अब इससे संतोष अवश्य हो जायेगा सुनोजब भगवान् श्रीकृष्ण मिथिला में विप्र श्रुतदेव के यहाँ ऋषियों सहित पधारे हैं तब श्रुतदेव से कहते हैं कि ब्राह्मण इस लोक में जन्म से ही सभी प्राणियों से श्रेष्ठ होता है इस पर भी यदि उसमे तपश्चर्याविद्यासंतोषमेरी उपासना हो तब तो कहना ही क्या ?— 
“ ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान्सर्वेषां प्राणिनामिह तपसा विद्यया तुष्ट्या किमु मत्कलया युतः ||
--भागवत महापुराण,१०/८६/५३

जो लोग “ जन्मना जायते शूद्रः –” ऐसा प्रलाप करते हैं वे इस प्रमाण से समझने की चेष्टा करें कि ब्राहमणत्व जाति जन्म से ही आती है इसके बाद ३ श्लोकों मे विप्रों की महिमा का विशद वर्णन करने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं अपने श्रीमुख से कृष्णद्वैपायन व्यास ओर शुकदेव आदि को उद्देश्य करके श्रुतदेव से कहते हैं कि हे विप्र ! इसलिये तुम इन ब्रह्मर्षियों को मेरा ही स्वरूप समझकर अर्चना करो ---
“ तस्माद् ब्रह्मऋषीनेतान् ब्रह्मन् श्रद्धयार्चय |
--भागवत महापुराण,१०/८६/५७
यहां कृष्णद्वैपायन व्यास उनके पुत्र शुकदेव आदि को ब्रह्मर्षि कहा गया है अतः इस भग्वद्वचन से विरुद्ध व्यास जी को शूद्र कहने वाले कितने प्रामाणिक हैं ?

-–इसका निश्चय सुधी जन स्वयं करें इसी प्रकार अन्य ऋषियों के विषय में भी समझना चाहिएजिन्हें वेदमंत्र--द्रष्टा बतलाते हुए आज शूद्र कहा जा रहा है

Saturday, October 26, 2013

ऋषिस्मृति


पर्जन्यमापनासाठी आपण आज जशी साधने वापरतो, तशी पूर्वी काही योजना होती. सृष्टीज्ञानाच्या नानाविध शाखांवर ग्रंथलेखन करणारे ६ व्या शतकातील महान शास्त्रज्ञ वराहमिहिर यांनी पुढील प्रयोग सांगितला आहे. (बृहद्संहिता २३/२) एक अरत्नी मानाचे, म्हणजे १८ इंच व्यासाचे एक कुंड ठेवायचे. त्या कुंडाला ‘मागधमान म्हणतात. हे कुंड आंब्याच्या झाडाचे करतात. हे कुंड १२ अंगुले, म्हणजे ९ इंच उंच, लांब आणि रुंद असे असते.
 चाणक्यानेदेखील त्याच्या ग्रंथात विशिष्ट ढगांची माहिती दिली आहे. ढगांचे प्रकार, पाऊस पाडणारे ढग, सूर्य, गुरु आणि शुक्र यांचे स्थान अन् गती यांवरून कोणते ढग वर्षाव करतील, ते दिले आहे.
कौटिल्याच्या अर्थशास्त्रात १४३ प्रकारच्या ढगांचा निर्देश आहे. त्यांतील तीन प्रकारचे ढग हत्तीच्या सोंडेसारखे आणि मुसळधार पावसाचा वर्षाव सतत ७ दिवसांपर्यंत करतात. ८० प्रकारचे ढग केवळ सिंचन करतात आणि ६० प्रकारचे ढग केवळ सूर्यप्रकाशातच प्रकटतात.  
यांच्या बृहत्संहितेतील २१ ते २८ या अध्यायांत वर्षाकालाविषयी शास्त्रीय माहिती आहे. प्रारंभी वराहमिहिर म्हणतात, ‘अन्न हे वर्षाकालावर अवलंबून असून ते जगताचा प्राण आहे. त्यासाठी वर्षाकालाविषयी प्रयत्नपूर्वक ज्ञान मिळविणे आवश्यक आहे. पावसाळ्यापूर्वी काही महिने मेघ उत्पन्न होण्याची प्रक्रिया चालू होते. तिला ‘गर्भधारणा म्हणतात. चंद्र पूर्वाषाढा नक्षत्रांत प्रविष्ट झाल्यानंतर मार्गशीर्ष महिन्यात गर्भधारणेची लक्षणे स्पष्ट दिसतात. गर्भधारणेनंतर साडे सहा महिन्यांनी प्रसव होतो, म्हणजे मेघ जलवर्षाव करतात. (बृहद्संहिता २१-७) उत्तर किंवा पूर्व दिशांकडून शीतल वायू, निर्मळ आकाश, विविध रंगांचे ढग, मंद मेघगर्जना आणि पक्ष्यांचा मधुर ध्वनी अशी गर्भपुष्टीची लक्षणे आचार्य वराहमिहिराने सांगितली आहेत. 
विपुल वृष्टी करणारे मेघ कोणते आणि ते कसे असतात, हे वराहमिहिर यांनी बृहद्संहितेत सांगितले आहे. त्याने आवर्तमेघ, संवर्तमेघ, पुष्करमेघ आणि द्रोणमेघ, असे मेघाचे चार प्रकार सांगितले.
१. आवर्तमेघ : हे एखाद्या विशिष्ट स्थळी वृष्टी करतात.
२. संवर्तमेघ : हे सर्वत्र वृष्टी करतात.
३. पुष्करमेघ : हे अल्पवृष्टी करतात.
४. द्रोणमेघ : हे अती विपुलवृष्टी करतात.
    उल्कापात, अग्नीपात, धुलीवर्षाव, भूकंप व इंद्रधनुष, असे उत्पात आणि ते दिसले, तर ‘गर्भाचा उपघात होतो, असे त्याने बृहद्संहितेत सांगितले आहे. (बृहद्संहिता २१/ २५-२७)
    वराहमिहिराने पावसाच्या संदर्भात एक प्रयोग सांगितला आहे. आषाढ महिन्याच्या कृष्णपक्षात चंद्राने रोहिणी नक्षत्रात प्रवेश केला की, एक ब्राह्मण गावाच्या उत्तरेला वा पूर्वेला जात असे. तो तीन दिवस उपवास करून विराट श्रीविष्णूची प्रार्थना करीत असे. तो जमिनीवर ग्रह-नक्षत्रांच्या आकृत्या काढून श्रीविष्णूची पूजा करीत असे. नंतर चार दिशांना चार कलश मांडून ठेवीत असे. उत्तरेचा कलश श्रावण महिन्याचे, पूर्वेचा कलश भाद्रपद महिन्याचे, दक्षिणेचा कलश आश्‍विन महिन्याचे आणि पश्‍चिमेचा कलश कार्तिक महिन्याचे प्रतीक होत. जो कलश पाण्याने भरून जाईल, त्या महिन्यात हत्तीच्या सोंडेसारखा पाऊस पडेल, असे समजले जायचे. हे संकेत खरे ठरायचे आणि अशा पुरुषांचा समाजात नेहमी गौरव होत असे.
ऋषिस्मृति - २, आचार्य वराहमिहिर, प.पू. गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी)