आमची भूमिका !

सनातन हिंदु धर्म आणि संस्कृती यांच्या विध्वंसनाचे कार्य करणारे खिस्ती आणि इस्लाम यांसारखे धर्म, अर्थ आणि काम यांवर केंद्रित पाश्चात्त्य जीवनरहाटी असणार्‍या विध्वंसकाचे हात बळकट करणारे आपल्या देशातील जे निधर्मी, पुरोगामी आहेत, त्यांचा आधी बंदोबस्त करावा लागेल. बाहेरच्या शत्रूशी केव्हाही लढता येईल; परंतु घरातील या चेकाळणार्‍या शत्रूचे काय ? आधी घरातील विंचू मारा, मग उंबरठ्यावरील सापाला ठेचा. ‘हिंदूंच्या मनावर हे बिंबवणे’, हेच या लेखांचे एकमेव उद्दिष्ट आहे.

Friday, January 31, 2014

भगवान् व्यास ब्राह्मण हैं, शूद्र नहीं

भगवान् कृष्णद्वैपायन व्यास महर्षि परासर के द्वारा माँ सत्यवती से उत्पन्न हुए इन्हें शास्त्रनाभिज्ञ कुछ लोग शूद्र कहते हैं उनका कहना है कि नाविक की कन्या ( शूद्रकन्या ) सत्यवती थीं अतः उनसे महर्षि परासर द्वारा उत्पन्न व्यास जी शूद्र हुए इन लोगों से एक प्रश्न है कि जब शूद्र और ब्राह्मण दोनों से व्यास जी समुत्पन्न हैं तो आप मातृपक्ष को ध्यान में रखकर उन्हें शूद्र ही क्यों मान रहे हैं पितृपक्ष को देखकर उन्हें ब्राह्मण क्यों नही कहते केवल अपना उल्लू सीधा करना है न निष्पक्ष तो माता पिता पर जब ध्यान देगा तो उसे संदेह होगा कि व्यास जी को ब्राह्मण माना जाय या शूद्र किन्तु दुराग्रही अपनी मानसिकता थोपेगा कि वे शूद्र ही थे वस्तुतः उन्हें शूद्र इसलिए मानना कि वे शूद्रकन्या से उत्पन्न हुए थे यह मात्र भ्रान्ति ही है क्योंकि माँ सत्यवती शूद्रकन्या थीं ही नही केवल कैवर्त द्वारा उनका पालन किया गया था उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा जी के शाप से मीनभाव को प्राप्त अद्रिका नामक एक श्रेष्ठ अप्सरा जो यमुना में मछलीरूप में निवास कर रही थीके उदर से हुई थीजिसमे कारण चेदि देश के परम प्रतापी महाराज उपरिचर वसु का वीर्य था 
--- तत्राद्रिकेति विख्याता ब्रह्मशापाद्वराप्सराः मीनभावमनुप्राप्ता बभूव यमुनेचरी || श्येनपादपरिभ्रष्टं तद्वीर्यमथ वासवम् |जग्राह तरसोपेत्य साSद्रिका मत्स्यरूपिणी || 
-- महाभारत,आदिपर्व,अंशावतरणपर्व६३/५८-५९-६०
उपरिचर वसु के वीर्य के प्रभाव से १०वे मास इसके उदर से एक बालक और बालिका को मत्स्यजीवियों ने निकाला और महाराज उपरिचर से इस रहस्य को बतलाया तो उन्होंने बालक को ले लिया जिसका नाम मत्स्य रखा और वह बाद में राजा बना – “ तयोः पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा स मत्स्यो नाम राजाSSसीद्धार्मिकः सत्यसंगरः ||--वहीं ६३व्यास जी की माँ शूद्रकन्या नही --- और जो कन्या थी उसके शरीर से मछली की गंध निकलती थी,उसे महाराज ने मछुवारे को दे दिया जिसका नाम सत्यवती पड़ा— 
“ सा कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यगन्धिनी राज्ञा दत्ता च दाशाय कन्येयं ते भवत्विति ||
--६७दाशकैवर्ते दाशधीवरौअमरकोष१/१०/१५

ध्यातव्य है कि यह कन्या भी एक प्रतापी क्षत्रियराजा के वीर्य द्वारा मत्स्यरूपिणी एक श्रेष्ठ अप्सरा से जन्मी है अतः बीज के प्रभाव को देखते हुए इसे क्षत्राणी ही कहा जा सकता हैशूद्र नही 
“ यस्माद्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोSभवन् पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्बीजं प्रशस्यते |
--मनुस्मृति१०/७२
“ बीजयोन्योर्मध्ये बीजोत्कृष्टा जातिः प्रधानम् 
मन्वर्थमुक्तावली
बीज और योनि के मध्य में उत्कृष्ट बीज वाली जाति ही प्रधान है इसीलिये तिर्यग योनि से समुत्पन्न लोग भी ऋषि हुए हैं और पूजित होने के साथ श्रेष्ठ भी माने गए 

क्या किसी बालक या बालिका का किसी अन्य जातीय व्यक्ति से पालन हो तो उसकी जाति बदल जायेगी माता सत्यवती की उत्पत्ति में किसी शूद्र या शूद्रा के रज अथवा वीर्य का कोई सम्बन्ध ही नहीऐसी स्थिति में केवल पालन करने मात्र से उन्हें शूद्र कहकर व्यास जी को शूद्र मानना केवल प्रज्ञापराध नही तो और क्या है 
विजातीय संसर्ग से सांकर्यदोष ---सांकर्य दोष २ प्रकार का होता है |
१-अनुलोम संकर ,
२- प्रतिलोम संकर 

अनुलोमसंकरउच्च वर्ण के पुरुष का निम्न वर्ण की कन्या के साथ विवाह विहित है मनुस्मृति-३/१३अतः इनसे उत्पन्न संतानें अनुलोम संकर की परिधि में हैं जैसे ब्राह्मण से क्षत्रिय कन्या द्वारा उत्पन्न संतान निषाद,क्षत्रिय से वैश्यकन्या द्वारा उत्पन्न माहिष्य तथा शूद्रकन्या से उत्पन्न उग्र कही जाती है इस प्रकार ब्राह्मण द्वारा ३क्षत्रिय से २ तथा वैश्य से १ कुल मिलाकर अनुलोम संकर संताने ६ प्रकार की हुईं प्रतिलोम संकर चूंकि निम्न वर्ण के पुरुष के साथ उच्च वर्ण की कन्या का विवाह शास्त्रानुमोदित नही है इसलिए शूद्र से ब्राह्मण ,क्षत्रिय और वैश्य की कन्या में उत्पन्न संतानें क्रमशः चांडालक्षत्ता और अयोगव कही जाती हैं
शूद्रादायोगवः क्षत्ता चाण्डालश्चाधमो नृणाम् वैश्यराजन्यविप्रासु जायन्ते वर्णसङ्कराः ||
--मनुस्मृति -१०/१२

ऐसे ही व्यभिचारजन्य संतानें,सगोत्रादि विवाह से समुत्पन्न त्तथा विहित उपनयन संस्कार से रहित व्रात्य संज्ञक संतानें भी वर्ण संकर कही जाती हैं | –अपने अपने वर्ण की विवाहिता कन्या से उत्पन्न संतानें ही अपने अपने वर्ण की होती हैंअन्यनहीं सांकर्य के अपवाद महर्षिगण 
--- उन ब्रह्मर्षियों की संतानों पर भी सांकर्य का प्रभाव नही पड़ता जो अपनी उत्कृष्ट तपश्चर्या से अलौकिक शक्ति सम्पन्न हो चुके हैं अत एव महर्षि विभांडक का अमोघ वीर्य जिसे मृगी पी गयी थीसे समुत्पन्न ऋष्यश्रृंग ब्राह्मण ही हुएउनके लिये विप्रेन्द्र शब्द प्रयुक्त हुआ है 
 “नान्यं जानाति विप्रेन्द्रो नित्यं पित्रनुवर्तनात् |
--वाल्मीकि रामायण,बा.का.९/५
ब्रह्मर्षि भृगु की पौलोमी नामक पत्नी जो पुलोम दानव की कन्या थींउनसे उत्पन्न च्यवन ब्राह्मण ही हुए 
पप्रच्छ च्यवनं विप्रं लवणस्य यथाबलम् |
--वा.रा.उ.का.६७/१

यहाँ माँ दानवकन्या है फिर भी मात्र पिता में ब्राह्मणत्व होने के कारण ही च्यवन में ब्राह्मणत्व आया अब क्षत्रियकन्याओं में ब्रह्मर्षियों द्वारा उत्पन्न संतानें वर्ण संकर न होकर ब्राह्मण ही हुईं इस तथ्य को सप्रमाण प्रस्तुत किया जा रहा है राजर्षि कुशनाभनन्दन गाधि (वा.रा.बा.का.३२/११,) की सत्यवती नामक कन्या से ब्रह्मर्षि ऋचीक का विवाह हुआ---
गाधिश्च सत्यवतीं कन्यामजनयत् तां च भार्गव ऋचीको वव्रे |
---तामृचीकः कन्यामुपयेमे अनन्तरं च सा जमदग्निमजीजनत् |
--विष्णु महापुराण ४/७/१२-१३-१४-१६-३२

यहाँ माता क्षत्रिया और पिता ब्राह्मण हैं फिर भी इन दोनों से समुत्पन्न जमदग्नि ब्राह्मण ही हुएवर्ण संकर नही यदि जमदग्नि जी ब्राह्मण नही होते तो उनसे उत्पन्न परशुराम जी ब्राह्मण कैसे होते इक्ष्वाकुवंशी महाराज रेणु की क्षत्रियकन्या रेणुका जो जमदग्नि की पत्नी थीं उनसे प्रादुर्भूत परशुराम जी ब्राह्मण ही हुएवर्णसंकर नही --- 
“ जमदग्निरिक्ष्वाकुवंशोद्भवस्य रेणोस्तनयां रेणुकामुपयेमे तस्यां चाशेषक्षत्रहन्तारं नारायणांशं जमदग्निरजीजनत् 
विष्णुमहापुराण ४/७/३५-३६
इन परशुराम जी के लिये ब्राह्मण शब्द स्पष्टतया प्रयुक्त हुआ है--- 
“ क्षत्ररोषात् प्रशान्तस्त्वं ब्राह्मणश्च महातपाः 
वा.रा. बा.का,७५/६

यहाँ सत्यवादी महाराज दशरथ ने परशुराम जी को महातपस्वी ब्राह्मण बतलाया है अतः सिद्ध होता है कि असीम शक्ति सम्पन्न ब्रह्मर्षियों से ब्राह्मण पुत्र की समुत्पत्ति हेतु ब्राह्मणकन्या अनिवार्य नही है वे दानव या क्षत्रिय की कन्या से भी ब्राह्मण संतान उत्पन्न कर सकते हैं इसीलिये भगवान मनु भी वीर्य को स्त्रीरूपी क्षेत्र से अधिक महत्त्व देते हुए कहते हैं --
“ यस्माद्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोSभवन् पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्बीजं प्रशस्यते ||
--मनुस्मृति१०/७२
“ बीजयोन्योर्मध्ये बीजोत्कृष्टा जातिः प्रधानम् 
मन्वर्थमुक्तावलीबीज और योनि के मध्य में उत्कृष्ट बीज वाली जाति ही प्रधान है इसीलिये तिर्यग योनि से समुत्पन्न लोग भी ऋषि हुए हैं और पूजित होने के साथ श्रेष्ठ भी माने गए श्रेष्ठता का तात्पर्य उनके ब्राह्मणत्व-- ख्यापन में है जिसे सप्रमाण अभी प्रस्तुत किया जा चुका हैं अतः इन साक्ष्यों के आधार पर ब्रह्मर्षि परासर द्वारा माता सत्यवती से समुत्पन्न भगवान् कृष्णद्वैपायन व्यास ब्राह्मण ही हैंशूद्र नही भागवत महापुराण का साक्ष्य— महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में ऋत्विक ब्राह्मणों के वरण का जब समय आया तो उन्होंने वेदवादी ब्राह्मणों का वरण किया जिनमें भगवान् व्यास का उल्लेख द्वैपायन शब्द से सुस्पष्ट किया गया है---
“ इत्युक्त्वा यज्ञिये काले वव्रे युक्तान् स ऋत्विजः |कृष्णानुमोदितः पार्थो ब्राह्मणान् वेदवादिनः || द्वैपायनो भरद्वाजः सुमन्तुर्गौतमोSसितः |
--भा.पु.१०/७४/६-७

यहाँ भगवान् कृष्णद्वैपायन का नाम सबसे पहले उल्लिखित है | ( यहाँ द्वैपायन शब्द कृष्णद्वैपायन का वाचक है इसके पूर्वपद कृष्ण का “ विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः ”—इस वार्तिक से लोप हो गया है | ) 
इतना ही नही ,जब भगवान् श्रीकृष्ण विदेहनगरी में पधारते हैं,उस समय उनके साथ कृष्णद्वैपायनव्यास तथा उनके पुत्र स्वयं शुकदेव जी भी हैं |इसका उल्लेख स्वयं शुकदेव ही कर रहे हैं --- 
“ आरुह्य साकं मुनिभिर्विदेहान् प्रययौ प्रभुः || नारदो वामदेवोSत्रिः कृष्णो रामोSसितोSरुणिः अहं बृहस्पतिः कण्वो मैत्रेयश्च्यवनादयः ||
--भागवत महापुराण,१०/८६/१७-१८
यहाँ कृष्णः शब्द कृष्णद्वैपायन का वाचक है उसके उत्तरपद द्वैपायन का 
“ विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः 
इस वार्तिक से लोप हो गया है यहाँ अहं शब्द से शुकदेव जी ने अपना उल्लेख किया है इन सबको यहाँ द्विज कहा गया है 
न्यमन्त्रयेतां दाशार्हमातिथ्येन सह द्विजैः मैथिलः श्रुतदेवश्च युगपत् संहताञ्जली ||
--भा.पु.१०/८६/२५

क्या इससे कृष्ण द्वैपायन व्यास ओर उनके पुत्र का ब्राह्मणत्व स्पष्ट नही हो रहा है भगवान् वेदव्यास शूद्र होते तो उनके पुत्र शुकदेव और स्वयं उनको यहाँ द्विज क्यों कहा जाता इतने पर भी व्यास जी को शूद्र कहने वालों तुम्हे संतोष न हो रहा हो तो अब इससे संतोष अवश्य हो जायेगा सुनोजब भगवान् श्रीकृष्ण मिथिला में विप्र श्रुतदेव के यहाँ ऋषियों सहित पधारे हैं तब श्रुतदेव से कहते हैं कि ब्राह्मण इस लोक में जन्म से ही सभी प्राणियों से श्रेष्ठ होता है इस पर भी यदि उसमे तपश्चर्याविद्यासंतोषमेरी उपासना हो तब तो कहना ही क्या ?— 
“ ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान्सर्वेषां प्राणिनामिह तपसा विद्यया तुष्ट्या किमु मत्कलया युतः ||
--भागवत महापुराण,१०/८६/५३

जो लोग “ जन्मना जायते शूद्रः –” ऐसा प्रलाप करते हैं वे इस प्रमाण से समझने की चेष्टा करें कि ब्राहमणत्व जाति जन्म से ही आती है इसके बाद ३ श्लोकों मे विप्रों की महिमा का विशद वर्णन करने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं अपने श्रीमुख से कृष्णद्वैपायन व्यास ओर शुकदेव आदि को उद्देश्य करके श्रुतदेव से कहते हैं कि हे विप्र ! इसलिये तुम इन ब्रह्मर्षियों को मेरा ही स्वरूप समझकर अर्चना करो ---
“ तस्माद् ब्रह्मऋषीनेतान् ब्रह्मन् श्रद्धयार्चय |
--भागवत महापुराण,१०/८६/५७
यहां कृष्णद्वैपायन व्यास उनके पुत्र शुकदेव आदि को ब्रह्मर्षि कहा गया है अतः इस भग्वद्वचन से विरुद्ध व्यास जी को शूद्र कहने वाले कितने प्रामाणिक हैं ?

-–इसका निश्चय सुधी जन स्वयं करें इसी प्रकार अन्य ऋषियों के विषय में भी समझना चाहिएजिन्हें वेदमंत्र--द्रष्टा बतलाते हुए आज शूद्र कहा जा रहा है

Tuesday, January 14, 2014

भारतीय काल गणना की वैज्ञानिक पद्धति



  • यह अति सूक्ष्म से लेकत अति विशाल है .यह एक सेकण्ड के ३००० वे भाग त्रुटी से शुरू होता है तो युग जो कई लाख वर्ष का होता है | ब्रिटिश केलेंडर रोमन कलेण्डर कल्पना पर आधारित था। उसमें कभी मात्र 10 महीने हुआ करते थे। जिनमें कुल 304 दिन थे। बाद में उन्होने जनवरी व फरवरी माह जोडकर 12 माह का वर्ष किया। इसमें भी उन्होने वर्ष के दिनो को ठीक करने के लिये फरवरी को 28 और 4 साल बाद 29 दिन की। कुल मिलाकर ईसवी सन् पद्धति अपना कोई वैज्ञानिक प्रभाव है।भारतीय पंचाग में यूं तो 9 प्रकार के वर्ष बताये गये जिसमें विक्रम संवत् सावन पद्धति पर आधारित है। उन्होने बताया कि भारतीय काल गणना में समय की सबसे छोटी इकाई से लेकर ब्रम्हांड की सबसे बडी ईकाई तक की गणना की जाती है। जो कि ब्रहाण्ड में व्याप्त लय और गति की वैज्ञानिकता को सटीक तरीके से प्रस्तुत करती है।आज कि वैज्ञानिक पद्धति कार्बन आधार पर पृथ्वी की आयु 2 अरब वर्ष के लगभग बताती है। और यहीं गणना भारतीय पंचाग करता है, जो कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर पूरी तरह से प्रमाणिकता के साथ खडा हुआ है। हमारी पृथ्वी पर जो ऋतु क्रम घटित होता है। वह भारतीय नववर्ष की संवत पद्धति से प्रारम्भ होता है। हमारे मौसम और विविध प्राकृतिक घटनाओं पर ग्रह नक्षत्रो का प्रभाव पडता है। जिसका गहन अध्ययन भारतीय काल गणना पद्धति मे हुआ
  • है भारतीय ज्योतिष ग्रहनक्षत्रों की गणना की वह पद्धति है जिसका भारत में विकास हुआ है। आजकल भी भारत में इसी पद्धति से पंचांग बनते हैं, जिनके आधार पर देश भर में धार्मिक कृत्य तथा पर्व मनाए जाते हैं। वर्तमान काल में अधिकांश पंचांग सूर्यसिद्धांत, मकरंद सारणियों तथा ग्रहलाघव की विधि से प्रस्तुत किए जाते हैं। विषुवद् वृत्त में एक समगति से चलनेवाले मध्यम सूर्य (लंकोदयासन्न) के एक उदय से दूसरे उदय तक एक मध्यम सावन दिन होता है। यह वर्तमान कालिक अंग्रेजी के 'सिविल डे' (civil day) जैसा है। 

एक सावन दिन में 60 घटी;
1 घटी 24 मिनिट साठ पल;
1 पल 24 सेंकेड 60 विपल तथा 2 1/2 विपल 1 सेंकेंड होते हैं।

  • सूर्य के किसी स्थिर बिंदु (नक्षत्र) के सापेक्ष पृथ्वी की परिक्रमा के काल को सौर वर्ष कहते हैं। यह स्थिर बिंदु
  • मेषादि है। ईसा के पाँचवे शतक के आसन्न तक यह बिंदु कांतिवृत्त तथा विषुवत् के संपात में था। अब यह उस स्थान से लगभग 23 पश्चिम हट गया है, जिसे अयनांश कहते हैं।
  • अयनगति विभिन्न ग्रंथों में एकसी नहीं है। यह लगभग प्रति वर्ष 1 कला मानी गई है। वर्तमान सूक्ष्म अयनगति 50.2 विकला है। सिद्धांतग्रथों का वर्षमान 365 दिo 15 घo 31 पo 31 विo 24 प्रति विo है। यह
  • वास्तव मान से 8।34।37 पलादि अधिक है। इतने समय में सूर्य की गति 8.27 होती है।
  • इस प्रकार हमारे वर्षमान के कारण ही अयनगति की अधिक कल्पना है। वर्षों की गणना के लिये सौर वर्ष का प्रयोग किया जाता है। मासगणना के लिये चांद्र मासों का। सूर्य और चंद्रमा जब राश्यादि में समान होते हैं तब वह अमांतकाल तथा जब 6 राशि के अंतर पर होते हैं तब वह पूर्णिमांतकाल कहलाता है। एक अमांत से दूसरे अमांत तक एक चांद्र मास होता है, किंतु शर्त यह है कि उस समय में सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में अवश्य आ जाय। जिस चांद्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं पड़ती वह अधिमास कहलाता है। ऐसे वर्ष में 12 के स्थान
  • पर 13 मास हो जाते हैं। इसी प्रकार यदि किसी चांद्र मास में दो संक्रांतियाँ पड़ जायँ तो एक मास का क्षय हो जाएगा। इस प्रकार मापों के चांद्र रहने पर भी यह प्रणाली सौर प्रणाली से संबद्ध है। चांद्र दिन की इकाई को तिथि कहते हैं। यह सूर्य और चंद्र के अंतर के 12वें भाग के बराबर होती है। हमारे धार्मिक दिन तिथियों से संबद्ध है। चंद्रमा जिस नक्षत्र में रहता है उसे चांद्र नक्षत्र कहते हैं। अति प्राचीन काल में वार के स्थान पर चांद्र नक्षत्रों का प्रयोग होता था।

काल के बड़े मानों को व्यक्त करने के लिये युग प्रणाली अपनाई जाती है। वह इस प्रकार है:
कृतयुग (सत्ययुग) 17,28,000 वर्ष
द्वापर 12,96,000 वर्ष
त्रेता 8, 64,000 वर्ष
कलि 4,32,000 वर्ष
योग महायुग 43,20,000

  • वर्ष कल्प 1000 महायुग 4,32,00,00,000 वर्ष सूर्य सिद्धांत में बताए आँकड़ों के अनुसार कलियुग का आरंभ 17 फरवरी, 3102 ईo पूo को हुआ था। 
  • युग से अहर्गण (दिनसमूहों) की गणना प्रणाली, जूलियन डे नंबर के दिनों के समान, भूत और भविष्य की सभी तिथियों की गणना में सहायक हो सकती है। वायु पुराण में दिए गए विभिन्न काल खंडों के विवरण के अनुसार, दो परमाणु मिलकर एक अणु का निर्माण करते हैं और तीन अणुओं के मिलने से एक त्रसरेणु बनता है। तीन त्रसरेणुओं से एक त्रुटि , 100 त्रुटियों से एक वेध , तीन वेध से एक लव तथा तीन लव से एक निमेष (क्षण) बनता है। इसी प्रकार तीन निमेष से एक काष्ठा , 15 काष्ठा से एक लघु , 15 लघु से एक नाडिका , दो नाडिका से एक मुहूर्त , छह नाडिका से एक प्रहर तथा आठ प्रहर का एक दिन और एक रात बनते हैं। दिन
  • और रात्रि की गणना साठ घड़ी में भी की जाती है। तदनुसार प्रचलित एक घंटे को ढाई घड़ी के बराबर कहा जा सकता है। एक मास में 15-15 दिन के दो पक्ष होते हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। सूर्य की दिशा की दृष्टि से वर्ष में भी छह-छह माह के दो पक्ष माने गए हैं- उत्तरायण तथा दक्षिणायन। वैदिक काल में वर्ष के 12
  • महीनों के नाम ऋतुओं के आधार पर रखे गए थे।
  • बाद में उन नामों को नक्षत्रों के आधार पर परिवर्तित कर दिया गया , जो अब तक यथावत हैं। चैत्र , वैशाख , ज्येष्ठ , आषाढ़, श्रावण , भाद्रपद , आश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष , पौष , माघ और फाल्गुन।
  • इसी प्रकार दिनों के नाम ग्रहों के नाम पर रखे गए- रवि , सोम (चंद्रमा) , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र और शनि। इस प्रकार काल खंडों को निश्चित आधार पर निश्चित नाम दिए गए और पल-पल की गणना स्पष्ट की गई। सृष्टि की कुल आयु 4320000000 वर्ष मानी गई है। इसमें से वर्तमान आयु निकालकर सृष्टि की शेष आयु 2,35,91,46,895 वर्ष है 

मकरसंक्रांती की हार्दिक शुभकामना!

Monday, December 23, 2013

धर्मनिरपेक्षता म्हणजे हिंदु विरोध !



 
भारतातल्या हिंदूंची सर्वाधिक मोठी शोकांतिका ही आहे की, त्यांना या आधुनिक भ्रष्ट, दुष्ट धर्मनिरपेक्षतेचा जबरीने साक्षी व्हावे लागत आहे. निधर्मीपणाचा इतका नीच, इतका निकृष्ट, इतका भ्रष्ट अवतार त्याला पहावा लागत आहे. नेहरूंनी आणि त्यांच्या अनुयायांनी या निधर्मीपणाचा उदो उदो केला. त्यांनीच त्या निधर्मीपणाला अत्यंत अधम, अती भ्रष्ट रूप दिले. या निधर्मी राष्ट्राच्या नावाखालीच हिंदूंचा सनातन धर्म, ती सनातन संस्कृती, तो हिंदूंचा राष्ट्रीय वारसा, ती संस्कृत भाषा, या सर्वांचे नरडे आवळून त्यांना हद्दपार करणे, हे सगळे या निधर्मीपणाच्या बुरख्याखाली घडत आहे. कनिष्काला त्याच्या गोधडीखाली दाबून गुदमवरून त्याचे प्राण घेतले, तसे निधर्मीपणाच्या गोधडीखाली हिंदूंचा तो राष्ट्रीय सनातन वारसा, तो सनातन धर्म, संस्कृती, यांचे प्राण घेतले जात आहेत. धर्मनिरपेक्षता म्हणजे ‘हिंदु विरोध !
    भारतातले हिंदुद्वेष्टे निधर्मी शासन संस्कृतला मृतवत (Dead) ठरवण्याकरता सर्व सत्ता-संपत्ती पणाला लावत आहे. भारताचा निधर्मीवाद सिद्ध करण्याकरता संस्कृत शिकवायचे नसेल, तर काय
शिकवायचे ? अरबी, चायनी, जपानी ? हिंदूंचे ग्रंथ, रामायण, महाभारत, पुराणे शिक्षण संस्थातून शिकवायला बंदी का ? संस्कृतवर बंदी का ? हिंदूंनी जीवनाशी किती द्रोही आणि विसंगत व्हावे ? ही का बुद्धीमानी आहे ? निधर्मीवाद्यांनाच या देशाचा कायदा घडवता यावा ? केवढा हा जुलूम ! हिंदुस्थानात जर आम्हाला आमच्या श्रुति-स्मृति, पुराणे अभ्यासता येत नसतील, तर आमचा स्वतःचा वारसा कुठे अभ्यासावा ? हॉवर्ड ? शिकागो, ऑक्सफर्ड, केंब्रिज येथे
   आज इंग्रजी शिकलेल्या (आंग्लाळलेल्या) भारतियांची शरिरे भारतीय आणि मन मात्र पाश्‍चिमात्य (पाश्‍चात्त्य विचारसरणीचा पगडा असलेले) होणे, हे भारताच्या वाढत्या लोकसंख्येपेक्षा अधिक वेगाने वाढत आहे. याला भारतियांच्या मनाची मृदूता आणि इतरांना सहज स्वीकारणारी वृत्ती कारणीभूत आहे. या तुलनेत जपान आणि चीन या देशांतील नागरिकांची मने अधिक सावध अन् कणखर आहेत. त्यांनी इंग्रजी बोलणार्‍या विज्ञाननिष्ठ विचारसरणी असणार्‍या जगताला त्यांची हुकूमत त्यांच्या खोलवर रुजलेल्या सांस्कृतिक रचनेवर अद्याप चालवू दिलेली नाही, हे सत्य लक्षात घेणे महत्त्वाचे आहे

गुरुदेव डॉकाटेस्वामीजी (घनगर्जितएप्रिल २०१०)

Sunday, December 1, 2013

तुम्ही गुन्हेगार आहात !

सर्व धर्म समान आहे का ? सर्वधर्मसमभाव हिंदु समाजावर का लादता ? सर्व धर्म समान आहेत, असे सांगता ? या विश्वात कोणत्याही दोन गोष्टी पूर्णपणे समान नाहीत. दोन वस्तू वा माणसांत भेद असायलाच हवा. त्याविना त्यांचे वेगळे अस्तित्व कसे असू शकेल ? कोणतीही दोन माणसे पूर्णतः एक असूच शकत नाहीत. मग सर्व धर्म समान कसे असू शकतील ? हा प्रश्नच मस्तकात मेंदू नसल्याचे लक्षण आहे'.

मॅट्रिकच्या (पूर्वीच्या दहावीच्या) मराठीच्या पाठ्यपुस्तकात ‘दोन शब्दांत दोन संस्कृती', असा एक पाठ आम्ही पाहिला. श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त ही एक संस्कृती आणि विज्ञाननिष्ठ प्रणाली (up-to-date) ही दुसरी संस्कृती. बुद्धीवादी आणि विज्ञाननिष्ठ प्रणालीचे अनुसरण केले पाहिजे. श्रुति-स्मृति पुराणोक्त धर्माचे आता दफन झाले पाहिजे, असा त्या विधानाचा आशय या पाठातून व्यक्त होतो. श्रुति-स्मृति पुराणोक्त ही संस्कृती अबुद्धीवादी आहे का ? विज्ञानविरोधी आहे का ? 

आमचे राष्ट्र आणि समाज यांचे लक्षावधी वर्षांपासून मंतरलेल्या अभेद्य कवचासारखे संरक्षण करणार्या भारतीय वेशभूषा, केशभूषा, खाणे, पिणे, चालणे, फिरणे, उत्सव, महोत्सव, चालीरीती, परंपरा इत्यादी गोष्टी आज आम्हाला तिरस्करणीय आणि हीन वाटू लागल्या आहेत. आमचे शासन, नेते, समाजकल्याणकर्ते, मानवहिताकरता झटणारे सुधारक, अशा यच्चयावत् उद्धारकर्त्यांना (?) जे जे आमचे सनातन आहे, ते ते नष्ट-भ्रष्ट करण्याची एकच एक घोर चिंता लागली आहे. या एकाच ध्येयाकरता ते सत्ता, संपत्ती, बुद्धी, सूक्त-असूक्त (चांगले-वाईट) यांची बाजी लावत आहेत. हिंदु समाजातील प्रत्येक गट आणि व्यक्ती यांच्यात स्वाभिमानाचा रतिमात्र अंश, अगदी केसाएवढासुद्धा शेष राहू नये, याकरता एक प्रचंड षड्यंत्र उभे ठाकले आहे. 

अस्पृश्यांना दलित, पिळले गेलेले (oppressed), असे म्हणून त्यांचे स्वत्व, स्वाभिमान आणि आत्मविश्वास यांचा विनाश करायचा का ? 

श्रेष्ठ वर्ग जो सवर्ण आहे, त्याला सांगायचे, 'तुम्ही गुन्हेगार आहात. तुमच्या बापजाद्यांनी, पूर्वजांनी घोर पातके केलेली आहेत, त्याची फळे आता भोगा'. अशाप्रकारे सवर्णांचे (श्रेष्ठवर्गाचे) स्वत्व, स्वाभिमान नष्ट करायचा का ? त्यांच्यात अपराधभाव (guilty conscious) निर्माण करायचा का ? हीनगंड पोसायचा का ? 
आज आमच्या संवेदनाही पश्चिमी बनल्या आहेत. केवढा दुर्विलास ! 

अशा स्वाभिमानशून्य, स्वत्वशून्य भ्याडांच्या सहकार्याने राष्ट्ररक्षण कसे होईल ?

- गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (साप्ताहिक सनातन चिंतन)

Sunday, November 24, 2013

हिंदु संस्कृती

रामराज्य परिषदेचे संस्थापक प.पू. करपात्रीस्वामी हे पहाटे तीन वाजता उठून प्रातर्विधी उरकत. दंतधावन केल्यावर ते विहिरीच्या गार पाण्याने स्नान करत. नंतर त्यांचे नित्य उपासनेचे कर्म करत. सायंकाळी ५ वाजता ते भोजन करत. त्यांचा ब्रह्मचारी शिष्य स्नान करून सोवळ्यात त्यांच्यासाठी स्वयंपाक करायचा. हाताने दळलेल्या गव्हाची पोळी, भात, मुगाच्या डाळीचे वरण, लिंबू, आले, गायीचे दूध आणि तूप. मीठ, मिरची, तिखट, साखर वर्ज्य ! ते अन्न कोळशाच्या शेगडीवर शिजवायचे. रात्री निजतांना ते गायीचे दूध घ्यायचे ! जेवणात फळे असायची. रासायनिक खतांचे धान्य आणि भाज्या वर्ज्य असत. रॉकेल किंवा गॅसवर शिजवलेले अन्नही वर्ज्य ! जेवणाच्या आधी ते पाण्याचा एक थेंबही तोंडात टाकत नसत. ते अखंड प्रवासात असायचे. त्यांच्या चारचाकी वाहनामध्ये कोळसे, शेगडी, गंगाजल, पूजासाहित्य अशी सर्व सामुग्रींची सिद्धता असायची. अखेरच्या श्‍वासापर्ंयत त्यांच्या नित्यकर्मात, योगक्षेमात रतीमात्र अंतर पडले नाही. हा त्यांचा दिनक्रम अखंड ६० वर्षें अव्याहत चालू होता. त्यांना कधी रोग (आजार) किंवा  दुखणे झाले नाही, त्यामुळे डॉक्टरकडे जावे लागले नाही ! शास्त्रकार सांगतात त्याप्रमाणे आहाराचे, खाण्यापिण्याचे नियम आणि धर्मशास्त्रानुसार आहार त्यांनी कठोरपणे अन् कटाक्षाने अखेरच्या श्‍वासापर्ंयत सांभाळला.
  

 आमचे प्राध्यापक मित्र सांगतात, ही अंधश्रद्धा आहे.

  • या अंधश्रद्धेच्या थयथयाटाने जग हादरले आहे. सावध होत आहे. आमच्या सनातन धर्माकडे हे सुसंस्कृत (sophisticated)  वैज्ञानिक प्रगत जग खेचले जात आहे. आम्ही मात्र डोळे उघडायला सिद्ध नाही.
  • आधुनिक जागतिक समाजाची आज कोठेही श्रद्धा नाही, कोणतेही तत्त्व नाही, आलो कोठून, जाणार कोठे यांचा त्यांना पत्ता नाही. अशाही परिस्थितीत स्वत:ला 'प्रगत' म्हणवणारा समाज, आम्हां हिंदूंना 'सनातनी' अशी शिवी देतो. 

- गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी ( साप्ताहिक सनातन चिंतन, १५.०४.२०१३)

Saturday, October 26, 2013

ऋषिस्मृति


पर्जन्यमापनासाठी आपण आज जशी साधने वापरतो, तशी पूर्वी काही योजना होती. सृष्टीज्ञानाच्या नानाविध शाखांवर ग्रंथलेखन करणारे ६ व्या शतकातील महान शास्त्रज्ञ वराहमिहिर यांनी पुढील प्रयोग सांगितला आहे. (बृहद्संहिता २३/२) एक अरत्नी मानाचे, म्हणजे १८ इंच व्यासाचे एक कुंड ठेवायचे. त्या कुंडाला ‘मागधमान म्हणतात. हे कुंड आंब्याच्या झाडाचे करतात. हे कुंड १२ अंगुले, म्हणजे ९ इंच उंच, लांब आणि रुंद असे असते.
 चाणक्यानेदेखील त्याच्या ग्रंथात विशिष्ट ढगांची माहिती दिली आहे. ढगांचे प्रकार, पाऊस पाडणारे ढग, सूर्य, गुरु आणि शुक्र यांचे स्थान अन् गती यांवरून कोणते ढग वर्षाव करतील, ते दिले आहे.
कौटिल्याच्या अर्थशास्त्रात १४३ प्रकारच्या ढगांचा निर्देश आहे. त्यांतील तीन प्रकारचे ढग हत्तीच्या सोंडेसारखे आणि मुसळधार पावसाचा वर्षाव सतत ७ दिवसांपर्यंत करतात. ८० प्रकारचे ढग केवळ सिंचन करतात आणि ६० प्रकारचे ढग केवळ सूर्यप्रकाशातच प्रकटतात.  
यांच्या बृहत्संहितेतील २१ ते २८ या अध्यायांत वर्षाकालाविषयी शास्त्रीय माहिती आहे. प्रारंभी वराहमिहिर म्हणतात, ‘अन्न हे वर्षाकालावर अवलंबून असून ते जगताचा प्राण आहे. त्यासाठी वर्षाकालाविषयी प्रयत्नपूर्वक ज्ञान मिळविणे आवश्यक आहे. पावसाळ्यापूर्वी काही महिने मेघ उत्पन्न होण्याची प्रक्रिया चालू होते. तिला ‘गर्भधारणा म्हणतात. चंद्र पूर्वाषाढा नक्षत्रांत प्रविष्ट झाल्यानंतर मार्गशीर्ष महिन्यात गर्भधारणेची लक्षणे स्पष्ट दिसतात. गर्भधारणेनंतर साडे सहा महिन्यांनी प्रसव होतो, म्हणजे मेघ जलवर्षाव करतात. (बृहद्संहिता २१-७) उत्तर किंवा पूर्व दिशांकडून शीतल वायू, निर्मळ आकाश, विविध रंगांचे ढग, मंद मेघगर्जना आणि पक्ष्यांचा मधुर ध्वनी अशी गर्भपुष्टीची लक्षणे आचार्य वराहमिहिराने सांगितली आहेत. 
विपुल वृष्टी करणारे मेघ कोणते आणि ते कसे असतात, हे वराहमिहिर यांनी बृहद्संहितेत सांगितले आहे. त्याने आवर्तमेघ, संवर्तमेघ, पुष्करमेघ आणि द्रोणमेघ, असे मेघाचे चार प्रकार सांगितले.
१. आवर्तमेघ : हे एखाद्या विशिष्ट स्थळी वृष्टी करतात.
२. संवर्तमेघ : हे सर्वत्र वृष्टी करतात.
३. पुष्करमेघ : हे अल्पवृष्टी करतात.
४. द्रोणमेघ : हे अती विपुलवृष्टी करतात.
    उल्कापात, अग्नीपात, धुलीवर्षाव, भूकंप व इंद्रधनुष, असे उत्पात आणि ते दिसले, तर ‘गर्भाचा उपघात होतो, असे त्याने बृहद्संहितेत सांगितले आहे. (बृहद्संहिता २१/ २५-२७)
    वराहमिहिराने पावसाच्या संदर्भात एक प्रयोग सांगितला आहे. आषाढ महिन्याच्या कृष्णपक्षात चंद्राने रोहिणी नक्षत्रात प्रवेश केला की, एक ब्राह्मण गावाच्या उत्तरेला वा पूर्वेला जात असे. तो तीन दिवस उपवास करून विराट श्रीविष्णूची प्रार्थना करीत असे. तो जमिनीवर ग्रह-नक्षत्रांच्या आकृत्या काढून श्रीविष्णूची पूजा करीत असे. नंतर चार दिशांना चार कलश मांडून ठेवीत असे. उत्तरेचा कलश श्रावण महिन्याचे, पूर्वेचा कलश भाद्रपद महिन्याचे, दक्षिणेचा कलश आश्‍विन महिन्याचे आणि पश्‍चिमेचा कलश कार्तिक महिन्याचे प्रतीक होत. जो कलश पाण्याने भरून जाईल, त्या महिन्यात हत्तीच्या सोंडेसारखा पाऊस पडेल, असे समजले जायचे. हे संकेत खरे ठरायचे आणि अशा पुरुषांचा समाजात नेहमी गौरव होत असे.
ऋषिस्मृति - २, आचार्य वराहमिहिर, प.पू. गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी)

Sunday, October 6, 2013

सनातन हिंदु धर्म हा काही Religion नाही !


हे जे काही इस्लाम (Religion), ख्रिश्‍चन (Religion) आहेत, ते आपल्या धर्मप्रसाराकरता अत्याचारी आणि आक्रमक होतात, तसेच खून अन् हत्याकांडे करतात; परंतु 'धर्म हा हत्याकांडे करतो, आततायी असू शकतो', असा पुसटता गंधही हिंदूंना सहन होत नाही.
     परम श्रेष्ठ मूल्य असलेल्या हिंदु धर्माला खच्ची करण्याकरीता ‘रिलिजन' म्हणजे ‘धर्म' असा अनुवाद करून 'जसे इस्लाम, ख्रिश्‍चन धर्म, तसाच हिंदु धर्म आहे', असे प्रतिपादन पाश्‍चात्त्यांनी केले. उन्नत आशय असलेला हिंदु धर्म बलवान झाला, तर हिंदु धर्मही आपल्या धर्मप्रसाराकरता इतर धर्माचा विध्वंस करील, जगातल्या इतर धर्मियांची हत्याकांडे करील आणि आपला धर्म प्रस्थापित करील, अशी आधुनिकांना भीती वाटते; म्हणून हिंदु धर्माचा उत्कर्ष कधी होऊच नये, असे त्यांना वाटते; म्हणून 'इस्लाम रिलिजन', 'ख्रिश्‍चन रिलिजन', असे जे काही आहेत, त्या धर्माच्या (रिलिजनच्या) ओळीत ते हिंदु धर्माला बसवतात. ‘रिलिजन' म्हणजे ‘धर्म' असा अर्थ सहेतूक त्यांनी दिला. वास्तविक हिंदु धर्म तसा कधीच नाही, नव्हता आणि असूही शकत नाही.

हिंदु धर्माला आक्रमक, आततायी ठरवण्याकरता नाना प्रकारचे लिखाण करणारे पाश्‍चात्त्य !
    हिंदु धर्माला आक्रमक, आततायी ठरवण्याकरता नाना प्रकारचे उपाय या पाश्‍चात्त्यांनी योजिले. त्याच्याकरता त्यांनी (मनमानी, खोटा) इतिहास लिहिला. 'हिंदूंनी बौद्धांवर आक्रमणे केली, हिंदूंनी बौद्धांची हत्याकांडे केलीत, हिंदूंनी बौद्धांचे आश्रम जाळून टाकलेत', अशा प्रकारचा नवा खोटा मध्ययुगीन इतिहास लिहिला. विशेष असे की, आमचा जो मध्ययुगीन इतिहास आहे, हा सगळा पाश्‍चात्त्यांनी लिहिला आहे. आजही ते हिंदूंना आक्रमक, आततायी, हत्याकांडे करायला मागेपुढे न पहाणारा हे ठरवण्याकरता नाना क्लृप्त्या योजित आहेत आणि करतही आहेत.
     आज जे काही चालले आहे ते असे. हिंदु हा आक्रमक, आततायी आहे, गोडसेवादी, मनुवादी आहे, हे ठरवण्याकरता ते आकांडतांडव करत आहेत. त्या उद्दिष्टाकरता ते एकही संधी जाऊ देत नाही. काही केले, तरी त्यांना काही पुरावे सापडत नाहीत; कारण हिंदु धर्म हा काही धर्म नाही.'
- गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (साप्ताहिक सनातन चिंतन, १७.३.२०११)

Tuesday, October 1, 2013

श्राद्धविधींना अयोग्य ठरवणारे आधुनिकांचे टीकात्मक विचार आणि त्यांचे खंडण


टीका : जिवंत पिता, लौकिक पितामह, प्रपितामह प्रभुतींचा सत्कार करणे हेच श्राद्ध !
- आर्य समाजाचे संस्थापक दयानंद स्वामी 
खंडण 
अ. श्राद्ध हे मृत व्यक्तीचेच होत असणे : जीवित पिता, पितामह यांचा सत्कार म्हणजे श्राद्ध, यासाठी स्वामी दयानंद मनूच्या ज्या श्‍लोकांचा संदर्भ देतात, त्यातून उलट हेच स्पष्ट केले आहे की, पिता जीवित असतांना त्याचे श्राद्ध होऊच शकत नाही. श्राद्ध हे मृत व्यक्तीचेच होते.
आ. धर्मशास्त्रात श्राद्ध केल्यामुळे होत असलेले परिणाम : पृथ्वीवर (दक्षिण दिशेला भूमी उकरून तिथे दर्भ पसरवून तीन पिंड ठेवायचे) तीन पिंड दान केले की, नरकस्थित पितरांचा उद्धार होतो. पुत्राने हरप्रयत्नाने मृत पित्याचे श्राद्ध करावे. त्यांचे नाव आणि गोत्र विधीवत् उच्चारून पिंडदानादी करण्याने त्यांना हव्य-कव्याची प्राप्ती होते. यामुळे त्यांच्या अतृप्त वासना पूर्ण झाल्याने ते तृप्तात्मे साहजिकच त्या कुटुंबाला त्रास देत नाहीत. इतकेच नव्हे, तर त्यांना गती मिळून ते पुढील लोकात जातात. श्राद्ध केल्याने त्याचे परिणाम चांगले होतात, हे प्रयोगाने सिद्ध झाले आहे.
    यामुळे आर्य समाजी दयानंद आणि आधुनिक यांचे वरील वक्तव्य चुकीचे आहे, हे दिसून येते; कारण तसे असते, तर श्राद्धात जे मोठे विधी-विधान आहे, त्याची काय आवश्यकता राहिली असती ?
- गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (घनगर्जित, डिसेंबर २००८ आणि जानेवारी २००९)

(म्हणे) संकेतस्थळाच्या माध्यमातून पिंडदान करा ! 
साधक : गुरुदेव, बिहार शासनाचे उपमुख्यमंत्री धार्मिक आणि हिंदु धर्म अन् संस्कृतीचे मोठे अभिमानी आहेत. प्रत्यक्षात तसे संकेतस्थळाच्या माध्यमातून पिंडदान त्यांनी चालू केले आहे. विदेशातील हिंदूंकरता व्ही.डी.ओ. कॉन्फरन्सिंगद्वारे पिंडदान करण्याची व्यवस्था केली आहे. त्यांनी घोषित केले आहे की, आमच्या पर्यटन विभागाने विदेशात रहाणार्याक हिंदूंकरता गतवर्षापासून संकेतस्थळाच्या माध्यमातून पिंडदानाची व्यवस्था केली आहे. त्यांच्या या उपक्रमाचे विदेशात सर्वत्र स्वागत होत आहे. वर्णधर्म, जाती इत्यादींचे निर्मूलन करू पहाणार्या ईश्वराचे अधिष्ठान न मानणार्या, अंत्येष्ठी श्राद्धाचा प्रखर तिरस्कार करणार्या , ज्यांना श्राद्धविधी नष्ट करायचा आहे अशा नवहिंदुत्ववाद्यांनी ऑनलाईन पिंडदानाचे स्वागत केले आहे.
गुरुदेव : हे उलट्या खोपडीचे आमचेच आंग्लछायेचे हिंदू काय काय उपद्व्याप करतील कोण जाणे ? हे सगळे हिंदु समाजाचे कडवे शत्रू आहेत. लक्षावधी वर्षांपासून कोटी कोटी लोकांनी पितरांना मुक्ती देणार्या ‘गया या परमपवित्र क्षेत्री आता पितरमुक्तीकरता पिंडदान करायला येण्याची आवश्यकता नाही !
  पितरमुक्तीकरता पिंडदान करणार्या गया क्षेत्राचे महिमान, असे सगळे श्रुती-स्मृति पुराणांतून सर्वत्र आहे. लक्षावधी हिंदू पितरमुक्तीकरता प्रत्यक्ष गयेला येऊन पिंडदान करतात आणि पितरांचे आशीर्वाद घेतात. ज्यांना पिंडदान करायचे त्यांचे जे आप्त-स्वकीय आहेत, त्यांना प्रत्यक्ष गयेला येणे अपरिहार्य आहे. साक्षात भगवान रामप्रभु यांनी दशरथाची श्राद्धक्रिया प्रत्यक्ष गयेला येऊनच केली.
     शास्त्रप्रामाण्य हीच तर आम्हा हिंदु जीवनाची कवच कुंडले आहेत. शास्त्रमर्यादा उल्लंघणारा दांभिक आहे. संकेतस्थळाच्या माध्यमातून पिंडदान शास्त्रविरुद्ध ढोंग आहे. लक्षावधी वर्षांच्या आमच्या परंपरेवर आतंकवादापेक्षाही क्रूर आघात आहे. संकेतस्थळाच्या माध्यमातून पिंडदान करणारा शास्त्र उल्लंघून कुकर्म करतो.
    यः शास्त्रकिधिमुत्सृज्य कर्तते कामकारतः ।
     न स सिद्धिमकाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ - श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १६, श्लोनक २३
अर्थ : अशा स्वैराचारी मानवाला सुख, यश आणि परलोक तर नाहीच नाही. अशा दांभिकांना मी (भगवान) सर्प, विंचू, वाघादी क्रूर योनीत घालतो.
भगवान सांगतात,.....
    तानहं द्विषतः क्रुरान्संसारेषु नराधमान् ।
    क्षिपाम्यजस्रमशुभान् आसुरीष्केक योनिषु ॥ - श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १६, श्लोपक १९
अर्थ : त्या द्वेष आणि क्रूर कर्मे करणार्या् पापी नराधमांना मी संसारात वारंवार आसुरी योनीत टाकतो.
     ही जी आधुनिक तांत्रिक पद्धत (technology) आहे, ती आतंकवादापेक्षाही क्रूर आणि दुर्दैवी अशी अवदसा आहे. (Every advance in technology is the greatest misfortune.)
- गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (साप्ताहिक सनातन चिंतन, १६.१२.२०१०)

Tuesday, August 6, 2013

कोटी कोटी प्रणाम !
गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी यांची आज जयंती
हिंदूंचे भीषण अधःपतन होण्यामागचे कारण
     यामागे सनातन धर्माचा काहीच दोष नाही; किंबहुना सनातन धर्माचे अनुसरण करत नसल्यामुळे हिंदूंचे भीषण अधःपतन झाले आहे.
- गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (साप्ताहिक सनातन चिंतन, १०.३.२०११)

हिंदु संस्कृतीची अद्वितीयता

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशात् अग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ - मनुस्मृति २.२०
 अर्थ : या ब्रह्मवर्तादी देशात जन्माला येणारे जे चारित्र्यसंपन्न आणि विद्वान लोक असतील त्यांच्यापासून पृथ्वीवरील सर्व मानवांनी सदाचाराचे, सद्वर्तनाचे धडे घ्यावेत. आमच्या चरणाशी बसून विश्‍वातील यच्चयावत मानवांनी आचरणाचे वळण गिरवावे. 
आक्रमणाच्या उद्देशाने हिंदुस्थानात आलेल्यांनी हिंदु धर्म स्वीकारून हिंदु संस्कृतीशी एकरूप होणे 
१. तक्षशिलेच्या यवनराजाचा दूत हेलिओडरस याने तिथे गरुडध्वज उभारला आहे. त्यावरील लेखात तो भगवान विष्णूचा उपासक ‘भागवत असा स्वतःचा निर्देश करतो.
२. कांबोज, यवन, पल्हव, दरर, खश इत्यादी लोक पूर्वी क्षत्रिय होते; पण संस्कार न झाल्याने त्यांना वृषलत्व (शूद्रत्व) प्राप्त झाले. धार्मिक संस्कार न झाल्यामुळे मूळचे क्षत्रिय असूनही त्यांना शूद्रत्व प्राप्त झाले; म्हणूनच ते क्षत्रियत्वाचे संस्कार त्यांच्याकडून करवून घेऊन त्यांना क्षत्रियत्वाचा अधिकार दिला गेला.

३. परकीय आक्रमणात हूण हे प्रसिद्ध आहेत. हिंदुस्थानात आल्यावर त्यांनी हिंदु धर्म स्वीकारला. हूण राजा मिहिरकुल हा शिवोपासक होता. हुणांनी भारतात राज्य स्थापिले. हळूहळू ते हिंदु संस्कृतीशी एक होऊन गेले. फुढे त्यांची गणना राजपुतांच्या श्रेष्ठ कुळात होऊ लागली. इथे जात्युत्कर्ष आहे.
४. कुलचुरी हे स्वतःला चंद्रवंशी म्हणवतात. त्या कुलातील महाप्रतापी कर्णनृपतीचा विवाह हूण राजकन्या आवल्लदेवीशी झाला होता. त्यांचा पुत्र यशःकर्ण हा पित्यानंतर गादीवर आला. राजपूत राजे कडवे हिंदु धर्माभिमानी होते. त्यांनी हिंदु धर्म व संस्कृती यांच्या रक्षणाकरता वेळप्रसंगी प्राणार्पण करायलाही मागे पुढे पाहिलेले नाही.
कर्मफल आणि पुनर्जन्म यांवरील श्रद्धेमुळेच हिंदु समाज भ्रष्टाचार अन् गुन्हेगारी यांपासून सहस्रशः वर्षे दूर असणे 
    प्रत्येक हिंदूच्या अंतर्यामी आपल्या कर्माप्रमाणे आपल्याला सुख-दुःख प्राप्त होते, अशी श्रद्धा आहे. आफल्याला आपल्या कर्माची फळे या जन्मात किंवा पुढच्या जन्मात भोगावी लागतात. कर्मफलाच्या धारणेमुळेच हिंदु समाज भ्रष्टाचार आणि गुन्हेगारी यांपासून सहस्रशः वर्षे दूर राहू शकला. स्वातंत्र्याच्या काळापर्यत कर्मफल आणि पुनर्जन्म यांविषयीची श्रद्धा कायम होती. स्वातंत्र्यानंतर ती क्षीण होत गेली आणि आता जवळजवळ नष्ट झाली आहे.
भारतभूमीची सहस्रो वर्षांची तेजःपुंज परंपरा तरुण पिढीत अपूर्व प्रज्ञा, प्रतिभा, बल आणि सत्त्व विकसित करील 
    स्वामी विवेकानंद अमेरिकेला खडसावतात, तुमचे ज्ञान, तुमची संस्कृती आणि तुमची जीवनशैली ही केवळ वरवरची आहे. थोडेसे घासले की, त्या कातडीखालचा हिंस्त्र पशू उसळून वर येतो. आपल्या थोर व पावन भारतभूमीची सहस्रो वर्षांची परंपरा आपल्या पाठीशी उभी आहे. त्याची लाज कशाकरिता ? ही तर आमची तेजःपुंज ज्वलंत अस्मिता आहे. जगाला ही वैशिष्ट्येच शिकवायची आहेत. भारताने नेतृत्व करायचे आहे. ही जी ज्वलज्जहाल अस्मिता आहे, तीच आमच्या तरुण पिढीत अपूर्व प्रज्ञा, प्रतिभा, बल आणि सत्त्व विकसित करील. 
- गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

Tuesday, July 23, 2013

गोरक्षणासाठी सिंहासमोर स्वतःला झोकून देणारा हिंदूंचा रघुवंशातील पराक्रमी राजा दिलीप !



         श्रीरामप्रभूच्या रघुवंशाची ही कथा विख्यात आहे. रघुवंशातील तो थोर राजा दिलीप ! चक्रवर्ती सम्राट दिलीप गोव्रत आचरतो. त्याच्या पूजनीय अशा नंदीनी गाईला कोवळे गवत खायला देतो. तिची पाठ व मान खाजवितो. तिच्या अंगावर बसलेले डास उडवून लावतो. कुलगुरु वसिष्ठांच्या न थांबणार्‍या त्या नंदिनी गायीच्या पाठोपाठ छायेसारखा असतो. गाय बसली की, तो बसतो. गाय चालायला लागली की, तो चालू लागतो. एक दिवस त्या अरण्यात एक महाकाय, महाक्रूर सिंह राजासमोर उभा रहातो. त्या नंदिनी गायीला खायला तो सिद्ध असतो. राजा धनुष्य सज्ज करतो. सिंह म्हणतो, `तुझा देह दिलास, तरच मी गायीला सोडीन! ही एकच शर्थ आहे.’ राजा दिलीप सम्राट आहे तरुण, सुंदर, शक्तीमान व कांतीमान आहे. प्रजेचा पालनकर्ता, रक्षणकर्ता आहे. प्रजेचा आधार आहे. गोरक्षणाकरिता स्वदेह तृणवत् मानून सिंहाला द्यायला तयार होऊन उद्गारतो, `गोरक्षा हेच माझ जीवितकार्य! गाय सोडून का परत जाऊ ? अपकीर्तीने लडबडलेला देह राजधानीला परत नेण्यापेक्षा मृत्यू फार फार चांगला. मी क्षत्रिय आहे. क्षतांचे तारण करणारा तोच क्षत्रिय !’
          राजा सिंहाला पुढे सांगतो, `सिंहराज, तुला माझी कणव येते. ‘क्षुद्र गायीच्या मोबदल्यात सम्राटाचा देह ! हा राजा मूर्ख असला पाहिजे’, असे तू म्हणतोस. माझ्या शरीराचा व माझ्या जीवनाचा तुला कळवळा येतो. त्यापेक्षा माझ्या यशरूपी शरीराचे रक्षण का करत नाहीस ? कृपाच करायची, तर माझ्या यशरूपी कायेवर कर. या दृश्य, अन्नमय, जड व क्षुद्र देहाची करुणा करायचे  कारण नाही. माझ्या साक्षीने व माझ्या डोळ्यांदेखत नंदिनीची हत्या झाली, तर रघुवंशाची कीर्ती कलंकित होईल. माझ्यावर करुणाच करायची असेल, तर माझा देह भक्षण कर आणि नंदिनीला मुक्त कर. त्यामुळे माझी यशरूपी काया चिरंतन राहील.’’
          रघुवंशाचा श्रेष्ठतम सम्राट दिलीप, गायीकरिता तारुण्याने मुसमुसलेल्या स्वशरीराची आहुती द्यायला तत्पर असतो ! सागरापर्यंतच्या सर्व भूमीचा एकमात्र स्वामी, सार्वभौम, हाती घेतलेले कार्य  तडीला नेणारा, स्वर्गापर्यंत रथातून यात्रा करणारा, देवराज इंद्राचा सहकारी, क्षत्रियाला योग्य असे विधीनुसार अग्नीहोत्र करणारा, याचकांचे मनोरथ आदरपूर्वक पुरवणारा, अपराध्याला योग्य शासन करणारा, वेळेवर निजणारा, वेळेवर उठणारा, देण्याकरिता-त्यागाकरिताच धन संपादन करणारा, मुखातून असत्य बाहेर पडू नये; म्हणून अत्यंत मोजकेच बोलणारा, विजयेच्छू, ततीकरिताच विवाह करणारा, उत्तरायुष्यात मुनीसारखे वानप्रस्थी जीवन जगणारा आणि अखेरीला योगाभ्यासाने शरीराची खोळ बाजूला सारणारा असा हा भारताचा सार्वभौम सम्राट दिलीप !’
- गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (साप्ताहिक सनातन चिंतन, २६.१.२००६, वर्ष पहिले, अंक ८)

Wednesday, May 15, 2013

‘विवाहसंस्कारा’संबंधी टीका किंवा अयोग्य विचार आणि त्यांचे खंडण



अयोग्य विचार

‘सालंकृत कन्यादान म्हणजे हुंडा ! कन्या ही का दान करण्याची वस्तू आहे ? कन्यादान हे रानटीपणाचे आहे. स्त्रीला विनिमयाची वस्तू बनवणार्‍या रानटी संस्कृतीची ही अवस्था आजही टिकून आहे.

खंडण

 ‘संत तुकाराम महाराज सांगतात, `सालंकृत कन्यादान, पृथ्वीदानासमान ।’ संत तुकाराम महाराज रानटी होते का ? प्रेमविवाह हा ‘गांधर्व विवाह’ आहे. गांधर्व विवाहात कन्यादान हा प्रकार नाही.
कन्यादान म्हणजे हुंडा नव्हे ! कन्यादान शुल्क नाही. शुल्क (म्हणजे हुंडा इत्यादी) मिळावे, अशी अपेक्षा नाही. ती बुद्धीच नाही. सालंकृत कन्यादान ! विवाहप्रसंगी तिला तिचे वडील, भाऊ, आप्त इत्यादी सुवर्णादी अलंकार देतात, ते सालंकृत कन्यादान ! शुल्क बुद्धीचा तिथे अभावानेही गंध नाही. `दान’ याचा अर्थ ‘समर्पण’ हे विसरू नका.’
अयोग्य विचार
‘अनुवंश, कुलाचार, परंपरा असा सगळा धर्म आहे. धर्म माणसाला हाता-पायाच्या साखळदंडासारखा आहे’, असे साम्यवादी मानतात. विवाहामुळे मुक्त जीवनाला (स्वैर जीवनाला) प्रतिबंध येत असल्यामुळे, म्हणजेच कामवासनेची तृप्ती होत नसल्यामुळे विवाह हा मार्क्स आणि आजच्या आधुनिकांनी त्याज्य ठरवला. ते Glass-Water Theory अनुसरतात, म्हणजे ‘तहान लागली की, पाणी प्यायचे. त्यासाठी भांडे जवळ बाळगण्याची काय आवश्यकता’, असे साम्यवाद्यांचे मत आहे. तसेच ‘मुलांचे पोषण आणि संगोपन शासन करील’, असे ते म्हणतात.
खंडण
‘संततीचे संगोपन आणि पोषण करण्याला (खाजगी) आई-वडिलांपेक्षा शासन अधिक सक्षम आहे’, असे हे साम्यवादी सांगतात. असा समाज किती वर्षे टिकेल ? साम्यवाद जन्माला आला, तेव्हापासून अवघ्या ६०-७० वर्षांत तो कोलमडला. रशिया छिन्नभिन्न झाला. आमची समाजरचना शास्त्राप्रमाणे आहे. आम्हा हिंदूंच्या विवाहाचे हेतू सुप्रजा निर्माण करणे, धर्म आणि संस्कृती यांचे चिरंजिवित्व राखणे, मानवाचे ऐहिक हित साधणे आणि आध्यात्मिक समाधान प्राप्त करून घेणे, हे आहेत. आम्ही जातीधर्म, कुलधर्म आदींचे पालन करून अनुवंशाचे अबाधित्व राखतो. आमच्या विवाहामुळे निर्माण होणारा वंश हा जोवर भूलोकी नद्या, पर्वत, अरण्ये आहेत, तोवर राहिला पाहिजे.’

अयोग्य विचार
‘तो व्यभिचार नव्हे. ते कामसंतर्पण आहे’, असे साम्यवाद्यांचे मानणे आहे. कामतृप्तीसाठी विवाहबाह्य संबंधाला आजचा समाज मान्यता देतो.

खंडण
‘याचा अर्थ आधुनिक समाजाला व्यभिचार मान्य आहे ! ‘कामसंतर्पण’ हे सगळे थोतांड आहे. व्यभिचार हा नेहमी सुडाच्या स्वरूपाचा असतो. व्यभिचार करणार्‍या व्यक्ती प्रेमभावना इत्यादी सांगून आपल्या अनीतीचे नेहमी समर्थन करू पहातात. ज्यांच्यामध्ये अहंगड असतो, त्यांच्यामध्ये भावना अधिक प्रबळ असतात. भावनांमुळे कोणत्याही गोष्टींचे समर्थन होऊ शकत नाही.’
- गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (साप्ताहिक सनातन चिंतन)

Monday, April 29, 2013

श्रीमद्भागवत महापुराण मे राधा जी





विद्वान और पंडित जन कहते हैं की जिस समाधि की अवस्था में भागवत पुराण लिखा गया और जब राधा जी का प्रवेश हुआ तो वेद व्यास जी इतने डूब गए कि राधा चरित लिख ही नहीं सके| और सच्च तो यह है कि जो भागवत के प्रथम श्लोक



"श्री कृष्णाय वासुदेवाय" में "श्री" है...



इसका अर्थ है कि सबसे पहले राधा जी को नमन किया है | 



"श्री कृष्णाय वयं नम:" 



इसमें अकेले कृष्ण को नहीं 
"श्री कृष्ण" को नमन किया है |
सनातन धर्म में शक्ति-विशिष्ट ब्रह्म कि पूजा है | निराकार ब्रह्म कि पूजा नहीं हो सकती | वही ब्रह्म जब शक्ति-विशिष्ट होता है...तभी उसकी पूजा हो सकती है | 
"श्री" का अर्थ है "शक्ति" अर्थात "राधा जी" | 
शुकदेव जी पूर्व जन्म में राधा जी के निकुंज के शुक (तोता) थे| निकुंज में गोपिओं के साथ प्रभु क्रीडा करते थे और
शुकदेव जी सारा दिन राधा-राधा कहते थे| यह देख एक दिन राधा जी ने हाथ उठाकर तोते को अपनी ओर बुलाया | तोता आकर राधा जी के चरणों कि वंदना करता है |वह उसे उठाकर अपने
हाथ में ले लेती हैं और तोता फिर श्री राधे राधे बोलने लगा | तब राधा जी ने कहा, "अब तू राधा राधा नहीं, कृष्ण कृष्ण बोल" | इस प्रकार राधा जी तोते
को समझा ही रही थी कि तभी कृष्ण आ जाते हैं | राधा जी ने उनसे कहा कि यह
तोता कितना मधुर बोलता है और उसे प्रभु के हाथ में दे दिया | इस प्रकार राधा जी ने ब्रह्म के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध कराया | इसलिए उस जन्म में शुकदेव जी कि सद्गुरु श्री राधा जी हैं और
इसीलिए सद्गुरु होने के कारण भागवत में
राधा जी का नाम नहीं लिया अर्थात अपने गुरु का नाम नहीं लिया | जिस प्रकार यदि पत्नी अपने पति का नाम ले, तो उसकी आयु घटती है, उसी प्रकार सद्गुरु को मन में स्मरण कर 'सद्गुरु कि जय" कहना चाहिए, मर्यादा भंग
नहीं करनी चाहिए |
ऐसा शास्त्रों में वर्णन आता है | और दूसरा कारण राधा शब्द भागवत में ना आने का यह है कि यदि शुकदेव जी राधा नाम ले भी लेते तो वह उसी पल राधा जी के भाव में इतना डूब जाते कि पता नहीं कितने दिनों तक उस भाव से बहार
ही नहीं आ पाते | ऐसे में राजा परीक्षित के पास तो केवल सात ही दिन थे, फिर कथा कैसे पूरी होती| जब प्रभु ने राधा जी से पूछा कि इस साहित्य में तुम्हारी क्या भूमिका होगी? तब राधा जी ने खा कि मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए, में तो आपके पीछे हूँ | 



इसिलए कहा गया है कि 
कृष्ण यदि शब्द हैं तो राधा अर्थ है , कृष्ण गीत हैं तो राधा संगीत ह, 
कृष्ण वंशी हैं तो राधा स्वर हैं , 
कृष्ण समुन्द्र हैं तो राधा तरंग हैं, 
कृष्ण पुष्प हैं तो राधा उस पुष्प कि सुगंध हैं | 
इसीलिए राधा जी इसमें अदृश्य
रही हैं| उनका नाम "गुप्त रीति" से दो तीन स्थानों पर लिया गया है | 



भागवत में महारास के
प्रसंग का यह श्लोक विचारणीय है : 
"तत्रारभत गोविन्दो रास क्रीडा मनु व्रते |
स्त्रीरतनैरविन्तः प्रीतैरन्योन्यबद्धबाहुभि: 



" अर्थात भगवान् श्रीकृष्ण कि प्रेयसी और सेविका गोपिआं बहो में बाहें डाल खड़ी थी | 



श्रीमद्भागवत मे प्रसंग आता है कि वृन्दावन मे रासलीला करते हुए भगवान अंतर्ध्यान हो जाते हैं ...तो गोपियाँ व्याकुल होकर उन्हें खोजने लगती हैं ..मार्ग मे श्रीकृष्ण के साथ साथ एक ब्रजबाला के भी पदचिन्ह दिखाई दिये 
"अनया आराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वर: | 
यन्नो विहाय गोविन्द: प्रीतोयामनयद्रह: ||" 
अर्थात गोपिया आपस में कहती हैं :'अवश्य ही सर्व शक्तिमान कि वह आराधिका होगी, इसीलिए इसपर प्रसन्न होकर हमारे प्राण प्यारे श्यामसुंदर ने हमें छोड़ दिया है और इसे एकांत में ले गए हैं . स्पष्ट है कि यह गोपी और कोई नहीं, राधा जी ही थी | श्लोक में "आराधितो" शब्द में राधा नाम छिपा है